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Wednesday 23 August 2017
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गण त्रस्त … तंत्र भ्रष्ट … नेता मस्त … शायद ये है हमारा गणतंत्र

(दीपक “साहिल “ सुन्द्रियाल) सुना है गणतंत्र ….धनतंत्र ….छ्ल तंत्र …. में तब्दील होता जा रहा है ?? जनता नेताओ को और नेता नीतियों को कोसते है, क्या सच में समस्या इतनी गंभीर है? 26 जनवरी 1950, नेहरु जी ने कहा था “भारत अभी पूर्ण गणतंत्र नहीं बना है बल्कि पूर्ण गणतंत्र बनाने की प्रक्रिया में है …” और ये प्रक्रिया कहाँ पहुंची ये यक्ष प्रश्न बन गया है| प्रश्न कई है पर उतर किसी के पास नहीं, इस देश का आम इंसान आज भी रोटी कपडा और मकान जैसी मुलभुत सुविधाओ से वंचित है | आम व्यक्ति अभी भी अपने अधिकारों से अनभिग्य है | देश की जनता में ऐसे भी लोग़ है जो आज भी भूखे सोते है और लाखो ठन अनाज सड जाता है | युवाओ का रोजगार … आरक्षण में उलझ के रह गया है | शिक्षा व्यपार बनता जा रहा है और शिक्षक व्यपारी| हमने ब्रांडिंग तों सीख ली पर शिक्षा की गुणवता का क्या बना? शिक्षक भर्ती में हुए घोटाले शिक्षको की सीख पर ही प्रश्नचिन लगाती है | देश की राजनीति में आये धन्ना सेठ जब देश की गरीबी परिभाषित करते है तों सोने पे सुहागा हो जाता है | गरीबी पे दिए बेतुके बयांन नेताओ के जमीनी हहिकत से फासलो को पुख्ता करते है | इन नेताओ की हालत उस आमिर बच्चे की तरह है जिसने जिंदगी में कभी गरीब नहीं देखा अपनी आमिरी के चलते उसे गरीबी पर अपनी कल्पना अनुसार गरीबी पे निबन्ध लिखने को कहा दिया जाये तों वो लिखता है एक गरीब देश में एक गरीब गावं था, उस गरीब गावं में एक गरीब परिवार था परिवार में सब गरीब थे माँ भी बाप भी और यहाँ तक की बच्चे भी गरीब| उनके पास एक ही घर था उनका घर भी गरीब था बच्चो के कमरे भी गरीब थे उनका टी.वि, फ्रिज , कार भी गरीब थी उनका ड्राईवर और माली भी गरीब थे| घर में काम करने वाली नोकरानी भी गरीब थी | वो अपनी गरीबी के वजह से महीने में एक दो बार ही पिकनिक पे जा पाते थे | इस कहानी से चोकने की कतई आवश्यकता नहीं क्यंकि देश के हालत यही है जो गरीबी रेखा तय कर नीतियां बनते है उन्हें अंदाजा ही नहीं की गरीबी की समस्या कितनी विकराल है | पञ्च सितारा होटल के ऐ.सी कमरों में बेठ कर गरीबी के आंकड़े तय करने से देश की समस्या हल नहीं हो जाती ये बात गणतंत्र के 64 वर्षों बाद भी देश के नेता नहीं समझ पाए, हालत बत से बदतर होते जा रहे है | अमीरों और गरीबो की बिच की खाई और गहरी होती जा रही है | राजनीती एक गाली, एक अपशब्द के तौर पर प्रयोग होने वाला मात्र एक शब्द बनता जा रहा है |

जनता का विश्वास राजनेताओ से उठता जा रहा है अधिकतर नेता मक्कार …भ्रस्त व मौकापरस्त छवि लिए हुए है | आम आदमी के दो जून की रोटी के लाले पड़े है | राजनेताओं की माने तों महंगाई एक वैश्वेक समस्या है सारा विश्व इस से जूझ रहा है | यही कारण है की विदेशो में भी महंगाई के खिलाफ जनता में आक्रोश की स्थिति है |

कुछ एक आन्दोलन तों ये भी आरोप लगा चुके है की सरकारें धन्ना सेठो के एजेंट के रूप में काम कर रही है| कमर तोड़ महंगाई से आम आदमी त्रस्त है ..सरकार के गरीबी की रेखा के पैमाने जो भी हो पर हकीकत ये ही है की देश में गरीबो की संख्या कम नहीं हुई उसमे इजाफा हुआ है | अधिकतर योजनाये सरकारी फईलो में ही चल रही है | जनता के नाम पे पैसा सरकारी एजेंट डकार रहे है | सरकारी दफ्तरों में हर काम का रेट तय है जब तक स्पेसल नोट न लगे फाईल चल नहीं सकती| आम आदमी भी ये मान चूका है की इस भ्रष्ट तंत्र में यदि जीना है तों भ्रष्ट बनकर अपना काम किये जाओ|

साक्षरता के नाम पे हस्ताक्षर करना सिखा कर गरीबो के खून पसीने की कमीई हडपने के पुख्ता इंतजाम भी बिचोलिये कर गए है | आज हमारी देश की राजनीति में धन बल का बोल बाला है संसद में अधिकतर सांसद … तंत्र भ्रष्ट … नेता मस्त … करोड़पति है | राजनीति में बदते धन बल के प्रयोग से आम आदमी का चुनावी प्रक्रिया से गुजर कर आना आस्म्भव लगने लगा है | शिक्षा ,स्वास्थ्य , सुरक्षा , संरक्षण जेसे गंभीर मुद्दों में हम पिछड़ते जा रहे है |

लाखो किसान कर्ज में फंस कर अपनी जान दे चुके है ये वही भारत है जो कभी गावं में बसता था | जनता दुआर चुने हुए जन प्रतिनिधि जनता का खून चूस रहे है | विदेशो में भारतीय अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे है और देश में भाई भतीजावाद के सोजन्य से उच्च पदों पे बेठे नाकारा देश को कलंकित कर रहे है| देश की इस दुर्दशा का जिम्मेवार कौन है .. नेता ? या उनको चुनने वाली जनता | यदि आप आंकडो पे नजर दोडये तों 60 प्रतिशत जनता तों वोट करने आती ही नहीं फिर जो वोट करते भी है वो “मुझे क्या मिलेगा” के मायाजाल में फसे रहते है | राजनीति में बडते परिवारवाद भाई भतीजावाद, धन्ना सेठो का वर्चस्व, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है | यदि हम वोट सोच समझ कर नहीं करते तों हमे होहाला करने का भी कोई आधिकार नहीं है | जो जनता अपने प्रतिनिधि को अपने मुताबिक न चला सके तों ऐसी जनता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भी क्यों हो | इस से पहले ही गणतंत्र ….धनतंत्र ….छ्ल्तंत्र …बलतंत्र पे तब्दील हो समय आ गया है की हर एक नागरिक अपने हक की लड़ाई स्वम लड़े | आज जनता के पास सुचना का अधिकार (Right To Information) है | हर व्यक्ति का कर्तव्य बनता है की वो सरकर द्वारा किये गए खर्चे का ब्यौरा मांगे | नितियो का जमीनी स्तर पर निरिक्षण करे | क्यंकि देश की नितियों में कमी नहीं कमी है उसे चलाने वाले अधिकारियो की नियत में | अधिकारियो पर नकेल कसने और नीतिओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने जन प्रतिनिधियो को काबू करना आपका धर्म है ये देश आपका है और देश भक्ति सिद्ध करने के लिए आदोलन में झंडे उठाने की जरूरत नहीं जागरूक बने महज हस्ताक्षर करने वाले साक्षर नहीं|



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