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Monday 21 August 2017
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जन प्रतिनिधि के निर्णय जन हित में हो और उसके अनुरूप नीतियों, नियमों और कानूनों बन्ने चाहिए

(मणि राम शर्मा) भारत में लोकतंत्र के कार्यकरण पर समय समय पर सवाल उठते रहे हैं| पारदर्शी एवम भ्रष्टाचारमुक्त शासन के लिए शक्तियों के प्रयोग करने में पारदर्शिता और समय मानक निर्धारित होना आवश्यक है क्योंकि विलम्ब भ्रष्टाचार की जननी है| इस दिशा में सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 की धारा 4 (1) (b) (ii) में सभी स्तर के अधिकारियों की शक्तियां स्वप्रेरणा से प्रकाशित करना बाध्यता है किन्तु सरकारों ने इसकी अभी तक अनुपालना नहीं की है और सचिवगण अपनी शक्तियों के अतिक्रमण में निर्णय ले रहे हैं व नीतिगत मामलों में जन परिवेदनाओं को, बिना किसी सक्षम जनप्रतिनिधि/प्रभारी की अनुमति के, सचिव स्तर पर ही निस्संकोच निरस्त कर दिया जाता है| जो भी आंशिक सूचना अधिनियम की धारा 4 के अनुसरण में प्रकाशित कर रखी है वह बिखरी हुई है व एक स्थान पर उपलब्ध नहीं होने से नागरिकों के लिए दुविधाजनक है| लोक प्राधिकारियों ने धारा 4(1)(b)(i) से लेकर 4(1)(b)(xvii) तक की भावनात्मक अनुपालना नहीं की है और धारा 4 (1) (b) (ii) की तो बिलकुल भी अनुपालना नहीं की है| अत: अब धारा 4 (1) (b) (ii) की अनुपालना अविलम्ब की जानी चाहिए और धारा 4 से सम्बंधित समस्त सूचना एक ही स्थान पर समेकित कर बिन्दुवार/धारा –उपधारावार सहज दृश्य रूप में प्रदर्शित करने की व्यवस्था की जाये ताकि सुनिश्चित हो सके कि सभी प्रावधानों की अनुपालना कर दी गयी है व कोई प्रावधान अनुपालना से छूटा नहीं है|

एक मंत्रालय की समस्त निर्णायक शक्तियां प्रभारी मंत्री में ही निहित हैं और उसे परामर्श देने और निर्णय में सहायता देने के लिए विभिन्न स्तर के सचिव और कमेटियां हैं किन्तु उन्हें किसी भी नियम, नीति सम्बद्ध विषय या नागरिकों के प्रतिवेदन/याचिका को स्वीकार करने का अधिकार नहीं है| स्वीकृति के साथ ही अस्वीकृति का अधिकार जुड़ा हुआ है| अत: स्वस्प्ष्ट है कि किसी भी स्तर के सचिव को किसी जन प्रतिवेदन/याचिका को अन्तिमत: अस्वीकार करने का कोई अधिकार किसी कानून, नियम, अधिसूचना, आदेश आदि में नहीं दिया गया है और न ही लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में ऐसा कोई अधिकार किसी सचिव को दिया जा सकता है|

विधायिकाओं के मामले में सरकार को निर्देश देने की शक्तियाँ भी आसन में ही समाहित हैं अत: ऐसे किसी निवेदन को सचिव स्तर पर नकारने का भी स्वाभाविक रूप से कोई अधिकार नहीं है| चूँकि प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का यह अधिकार जनता को संविधान के अनुच्छेद 350 से प्राप्त है अत: इस मार्ग में बाधा उत्पन्न करने के लिए किसी भी आधार पर कोई भी सचिव प्राधिकृत नहीं है| यदि कोई प्रकरण वास्तव में स्वीकृति योग्य नहीं पाया जाए तो उसका अंतिम निर्णय भी सक्षम समिति या आसन ही कर सकता है| सदन की कार्यवाहियों की पवित्रता और श्रेष्ठता की सुरक्षा के लिए समस्त अधिकारियों को तदनुसार निर्दिष्ट किया जाना चाहिए और उनकी प्रशासनिक/निर्णायक शक्तियों/क्षेत्राधिकार को विधायिका की वेबसाइट पर सहज दृश्य रूप में प्रदर्शित किया जाए|

प्रजातंत्र के सफल संचालन के लिए आवश्यक है कि जन प्रतिनिधि जन हित में निर्णय लें और उसके अनुरूप नीतियों, नियमों और कानूनों का निर्माण कर उन्हें लागू करने का दायित्व अधिकारियों पर छोड़ दें तथा समय समय पर अपने अधीनस्थों के कार्य की, यदि सम्पूर्ण जांच संभव न हो तो, नमूना आधार पर जांच करते रहें कि वे उन निर्धारित नियमों की परिधि में ही कार्य कर रहे हैं| नीति भी कहती है कि राजा को सदैव विश्वासपात्र बना रहना चाहिए किन्तु उसे कभी भी किसी पर भी पूर्ण विश्वास नहीं करना चाहिए|

जन प्रतिनिधियों को रोजमर्रा के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए| जहाँ कहीं किसी नियम, नीति के अपवाद में को निर्णय लिया जाना हो वह मात्र सक्षम प्रभारी के अनुमोदन से ही लिया जाए| वास्तव में भारत में इससे ठीक विपरीत ढंग से कार्य हो रहा है अर्थात जन प्रतिनिधि रोजमर्रा के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं और अपने स्वामी भक्तों को ठेके, लाइसेंस आदि दिलाने में असाधारण रूचि रखते हैं| दूसरी ओर नीतिगत मामलों में जनता से प्राप्त प्रतिवेदनों को सचिव स्तर पर, बिना प्रभारी मंत्री की अनुमति के, निरस्त कर दिया जाता है| इस प्रकार दोनों ही एक दूसरे के क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण कर रहे हैं| शासन चलाना जनप्रतिनिधियों का कार्य है और प्रशासन चलाना अधिकारियों का कर्तव्य है| यदि नीतिगत मामलों में सचिव ही अंतिम निर्णय लेने लगें तो फिर देश में आपात स्थिति या राष्ट्रपति शासन में और लोकतांत्रिक सरकार के कार्यरत होने में अंतर क्या रह जाएगा यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका हमें भारतीय शासन प्रणाली में जवाब ढूंढना है|



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